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सिद्ध पीठ श्री ताड़केश्वर धाम


जनश्रुति - 1

यह एक 1500 साल प्राचीन मंदिर है जो कि भगवान शिव के नाम से जाना जाता है। ओर यह देवदार के वृक्षो से घिरा हुआ है। मन्दिर लैंसडौन से 36 किमी. दूरी पर है।ओर 1800 मीटर की ऊचाई पर स्थित है। ताड़केश्वर महादेव एक संत थे उन्हें देखकर भगवान शिव को पहचाना जाता था

ईश्वर पर ब्रहा स्वरूप है, जो कि सत्य सनातन है , कभी वह अपने खेल को निराकार रूप में, तो कभी साकार रूप में अपनी सत्ता का मान जगत को कराता है । ब्रहा विष्णु महेश (त्रिदेव) कोई ये अलग अलग भगवान नही, बल्कि उसी एक निराकार के शक्ति सम्पन्न अलग रूप है । यह संसार भी ईश्वर की माया का ही एक खेल है । जो जन्म देता है वह पालन भी करता है । परमात्मा अपने इस दायित्व से कभी पीछे नही हटते वह प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से संसारी जीवों के ऊपर अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखते है। भगवान का तो संसार मे अवतरण विशेष परिस्तिथियों मे ही होता है । वह बार बार तो संसार आ नही सकते इसलिए वह संसार में अपने अंश रूप मे कला अंत स्वरूप से ऐसे विशेष मानव संत, ऋषि या सिद्ध गुणों को प्रकट कर देते है जो संसार जीवों के ऊपर किसी न किसी रूप से उनका कल्याण करते रहते है। ताड़केश्वर भी एक सिद्ध पुरुष अजन्म संत वह शिव स्वरूप थे तथा भगवान शिव के ही तेजोमयी अंश के प्रकट हुये थे। वह दिगम्बर भेषधारी एक हाथ मे त्रिशूल एव चमता तथा दूसरे हाथ मे डमरू बजाते हुए, शरीर पर भष्म लगाये हुए, अपने ईष्ट शिव का जाप करते हुऐ इधर उधर विचरण किया करते थे । विचरण अवस्था मे यदि कोई मनुष्य गलत काम करते देखा गया या किसी को दोपहर तक हल जोतते देखा गया, अपने स्वार्थ के लिये गाय बैल को पीटते देखा गया तो उसे जोर से आवाज़ देकर फटकारते थे तथा उस आर्थिक एवं शारीरिक दंड देने की चेतावनी देते थे। जो उनकी शरण मे गया जिन्होंने उन्हें सही रूप मे पहचाना उन्हें उन्होंने मन इच्छित फल दिया। वह सिद्धपुरुष मानव को गलत काम करने में उन्हें ताड़ते थे । ताड़ने का अर्थ होता है। डांटना, फटकारना , पीटना इसलिए वह जन्म समुदाय मे ताड़केश्वर के नाम से प्रसिद्व हो गये । कुछ लोग उन्हें ताड़केश्वर के नाम से पुकारते है। जो की सही है तारक का अर्थ होता है तारना, पार लगाना, ये भक्तों को सांसारिक कष्टो से पार लगाकर उन्हें मन इच्छित भौतिक सुखों को प्रदान करते थे। इसलिये उन्हें ताड़केश्वर (दुखों को पार लगाने वाला ईश्वर) नाम से जाना जाता है।

यह संसार है यहाँ अच्छे बुरे सन्त असन्त, भक्त अभक्त सभी प्रकार के जीवन रहते है। पूर्वजन्मों के क्रमानुसार ही मनुष्य की प्रकृति और स्वभाव बनता है। कहा जाता है असवाल जाति का एक वीर पुरुष था उसे अपने बल पौरष पर घमंड था । वह अपना मन माना काम करना चाहता था। वह सोचता था कि हम अपनी इच्छा के मालिक है हम कैसा भी करें, क्या करें, कब तक करें हमारे काम पर रोड़ा अटकाने वाला वह फकीर कौन होता है। ताड़केश्वर द्वारा बार बार टोकना उसे अच्छा नहीँ लगता था। अहंकार के बुद्धि का नाश होता है उसकी सोचने की शक्ति खत्म हो जाती है उसे फिर अच्छा बुरा कुछ दिखायी नही देता । वह भी अंधा होकर शरीर पर तेल मलकर मलयुध करने ताड़केश्वर पर झपटा । दोनो मे मलयुध हुआ परंतु शरीर पर तेल मलने के कारण उसका शरीर ताड़केश्वर के पकड़ ने नही आ पा रहा था। अंत मे ताड़केश्वर उस पर पहलवान को छोड़ करके भागने लगे , शायद उनकी भी यही इच्छा थी । क्योंकि अब उसका समय आ गया था अपने तेजोमयी स्वरूप को भगवान शिव में विहीन करने का । वह वीर ताड़केश्वर को मारने उसके पीछे भागा भागते हुए ताड़केश्वर का पैर कन्दार (शाल) के पत्तो के ऊपर जोर से फिसला और वह नीचे जा गिरे पुनः संभलते हुए आगे बढ़े और एक घनघोर निर्जन वन मे जा पहुँचे । वह वन चारों तरफ कन्दार, चीड़, बांझ आदि वृक्षो एवं नाना प्रकार की झाड़ियो से घिरा हुआ था। वह जगह ताड़केश्वर को समाधिष्ट के लिये बहुत पसंद आयी उन्होंने निर्जन वन के चारों तरफ नजर दौड़ायी तो उन्हें चारो तरफ कन्दार (शाल) बांझ के वृक्ष ही दिखायी दिये कन्दार के वृक्षो को देखकर उन्हें बहुत क्रोध आया और उनकी क्रौधाग्नि से सभी कन्दार के वृक्ष सूखकर विलीन हो गये । उसके बाद उन्होंने उस वन के चारों तरफ एक सीमा रेखा खींच दी और श्राप के रूप मे यह घोषणा कर दी की मेरे इस सीमा के अंदर कन्दार के पत्ते, तेल एवं असवाल जाति प्रवेश न कर सकेगी। सच तो यह है कि भक्त भी उनके अभक्त भी उनके हैं। भगवान क्रोध भी करते हैं तो जीव कल्याण के लिये ही करते हैं उनके क्रोध मे भी हित छिपा रहता है। सन्त का राग द्वेष के क्या मतलब सन्त तो आत्माराम हुआ करता है। उनका श्राप देने का अभिप्राय सम्पूर्ण असवाल जाति के अपने भक्तो से नहीं था। उनका अभिप्राय तो असवाल जाति के उस वीर जैसे दम्बी, क्रोधी , अहंकारी , कामी, अभिमानी पुरुष मेरे इस छेत्र मे प्रवेश न कर सके ।

ताड़केश्वर का प्रसाद उनका आशीर्वाद लेने का सबको अधिकार हैं। अपने छेत्र की सीमा बांधने के बाद उन्होंने देखा की वह वन तो निर्जल है यहां दूर तक कहीं पानी नहीँ है तब उन्होंने अपने कमण्डल से जल की धारा पृथ्वी में गिराई वह जल अंदर ही अन्दर निकल थोड़ी दूर पर जल स्रोत के रूप मे फूट पड़ा । बाद मे ताड़केश्वर के भक्तो ने एवं प्रबंधक समिति ने बाहर फैलते इस जल पर तीन कुण्ड बनाये, इस तरह भगवान ताड़केश्वर ने एक निर्जल वन को जलयुक्त बनाया । बाद मे सिद्ध पुरुष ताड़केश्वर समाधिष्ठ होने के लिये एक स्थान पर बैठ गए और अपने दाएं बाएं त्रिशूल एवं चिमटा गाढ़ दिया तथा अपने शिव स्वरूप के चिंतन मे लीन हुआ और सिद्धस्वरुप ताड़केश्वर का तेजोमयी रूप उस लिंग मे समाहित हो गया। इस तरह वह सिद्ध पुरुष अंत मे अपने शिव स्वरूप मे विलीन हो गये। जमीन पर गाढ़े गये त्रिशूल एवं चिमटा भी विशाल देवदार के वृक्ष में बदल गए। आज भी उसी स्थान पर त्रिशूल और चिमटा रूप मे ये वृक्ष देखे जा सकते है ( आप त्रिशूल ओर चिमटा के वृक्षो की तस्वीरें गैलेरी मे देख सकते हो) यह वन देवदार के वृक्षो का तो नही था। परन्तु ताड़केश्वर की कृपा से ताड़केश्वर की सीमा रेखा तक सुगंधित वृक्ष प्रकट हो गए। आज भी ताड़केश्वर की सीमा से बाहर एक भी वृक्ष देवदार का नही देखा जा सकता और कदाचित एक आध वृक्ष जैसी सुगन्ध भी नहीँ होगी। बाद मे यहीं यही स्थान ताड़केश्वर के नाम से प्रसिद्ध हो गया । यह स्थान अति सुंदर एवं रमणीक है। यहां आकर मन को एक अद्भुत शांति मिलती है। यहां की सुगंधित मीठी मीठी हवा, स्रोत से निकलता पवित्र जल तथा यहा का मनमोहक वातावरण अनेकों रोगों को दूर कर शरीर को सुंदर स्वस्थ बनाकर दीर्घायत्व प्रदान करने वाला है। यदि कोई मनुष्य यहां आ करके स्वास्थ्य लाभ करना चाहता है जो उसे अपने अन्दर के सभी दुर्व्यसनों को दूर करके प्राप्त एवं सायं काल प्रतिदिन एक देवदार के वृक्ष के नीचे आसन लगाकर मन मे "ऊँ ताड़केश्वराय नमः " का चिंतन करते हुए नाक से धीरे धीरे लंबी सांस ऊपर खींचे तथा धीरे धीरे छोड़ते जाये। इस तरह की क्रिया परमात्मा की प्राकृतिक गोद मे एक माह तक करके मनुष्य अपने अंदर के अनेको रोगों से मुक्ति पाकर स्वास्थ्य लाभ कर सकता है। क्योंकि देवदार के ये साधारण वृक्ष नहीं इनकी हवा , छाया, सुगन्ध मे दैविक शक्ति का चमत्कार है। यहां देवदार का हर वृक्ष शिव स्वरूप है। यहां प्रतिदिन अनेकों तीर्थ यात्री अपनी मनोकामना पूरी करने के लिये ताड़केश्वर के दरबार में आते ही रहते हैं। परन्तु साल मे ताड़केश्वर की दो बार विशेष पूजा होती है जिसे देवपूजी कहते है।


जनश्रुति - 2


श्री ताड़केश्वर महादेव जी के विषय मे एक जनश्रुति यह भी है कि जब भगवान शिव से ताड़्कासुर राक्षस अमरता का वरदान पाकर उन्ही को मारने शिव जी के पीछे भाग रहा था तो ताड़केश्वर के निकट असवाल जाति के गांव के पास कन्दार (शाल) के पत्तों मे फिसल गये थे। जिस कारण वह चोटिल हो गयें फिर भी ताड़कासुर के पकड़ मे नही आ सके भगवान क्रोधित हुए और असवाल जाति एवं कन्दार (शाल) के वृक्ष एवं पत्तों को ताड़केश्वर धाम मे वर्जित कर दिया आज भी यह दोनों यहां नहीं आते। ताड़केश्वर धाम का कोई लिखित इतिहास नहीं है। जनश्रुति में ही इसके इतिहास की खोजना पड़ेगा। एक जनश्रुति के अनुसार यहां पर सरसों का तेल वर्जित है । क्यों यह स्पष्ट नहीं है मगर आज भी यहां पर देशी घी से ही ताड़केश्वर महादेव के मंदिर का दीया जलाया जाता है। कह सकतें हैं कि पुरातन समय में छेत्र में गाय आदि पशुओं को प्रचुर मात्रा मे पाला जाता रहा होगा छेत्र में सरसों का तेल दुर्लभ रहा होगा। घी सुलभ था इसलिए कह सकते है । यहां परम्परा बन गई कि घी से ही बत्ती जलायी जायेगी।

ताड़केश्वर महादेव की बहुत सारी जनश्रुतियों है यह भी एक जनश्रुति है इसका कोई इतहास नही । जनश्रुतियों मे ही इसके इतिहास को खोजना पड़ेगा। कृपा ध्यान दे मन्दिर में सरसों का तेल चमड़े की वस्तु और कन्दार के पत्ते ले जाना वर्जित है।


 






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